चुनाव या निर्वाचन

‘जम्हूरियत वह तर्ज-ए-हुकूमत है कि जिसमें,

बन्दों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते।‘

– मो. इकबाल

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। प्रजातांत्रिक शासत-प्रणाली में शासन जनता के हाथों में होता है। लेकिन यह संभव नहीं है कि जनता स्वयं शासर करे। इसमें जनता द्वारा चयनित या निर्वाचित प्रतिनिधि शासन चलाते हैं। इन प्रतिनिधियों का चयन जिस प्रक्रिया द्वारा होता है उसे ही ‘चुनाव या निर्वाचन‘ कहते हैं। चुनाव में विजयी उम्मीदवार देश का शासन चलाता है। अतः यह आवश्यक है कि प्रतिनिधियों का चयन सही हो अन्यथा देश में कुव्यवस्था फैल सकती है। इसलिए चुनाव प्रजातांत्रिक शासन-प्रणाली की आधारशिला है।

स्वतंत्र भारत में पांच वर्षों के अन्तराल पर आम चुनाव का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा मध्यावधि चुनाव और उन-चुनाव की भी व्यवस्था है। भारत में भली-भांति चुनाव सम्पन्न कराने के लिए चुनाव-आयोग की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग के सर्वोच्च पदाधिकारी को मुख्य चुनाव आयुक्त कहा जाता है। केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के अधीन राज्यों में भी राज्य निर्वाचन आयोग कार्य करता है। चुनाव में 18 वर्ष या ऊपर के सभी वयस्क स्त्री-पुरूष मतदाताओं को मन देने का समान अधिकार है, बशर्ते वह पागल, दिवालिया या आपराधिक चरित्र का न हो। चुनाव दो तरह से सम्पन्न कराए जाते हैं-1. प्रत्यक्ष, 2. अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष चुनाव में जनता सीधे अपना मत देकर प्रतिनिधियों का चयन करती है, जैसे- विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों का चुनाव। अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधि ही चुनाव में भाग लेते हैं। यथा- राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यसभा तथा विधान परिषद के चुनाव।

च्ुनाव के लिए सर्वप्रथम चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है। चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवार खड़ा करते हैं। इसके लिए चुनाव क्षेत्र निर्धारित रहते हैं। सम्पूर्ण चुनाव क्षेत्रों को छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया जाता है। उन इकाइयों के सभी मतदाता एक स्थान पर एकत्र होकर, पंक्तिबद्ध होकर मतदान करते हैं। उस स्थान को मतदान केन्द्र कहा जाता है। मतदान केन्द्र का सही संचालन करने के लिए उसका सबसे बड़ा अधिकारी पीठासीन अधिकारी कहलाता है। निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान के लिए पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है। प्रत्येक मतदान केन्द्र (बूथ) पर मतदाताओं की संख्या लगभग 500 से 1000 के बीच होती है। निर्धारित तिथि के एक दित पूर्व ही चुनाव कर्मचारी बूथ पर पर पहुंच जाते हैं। वे अपने साथ मतपत्र, मतपेटियां या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन (इ.वी.एम.) तथा अन्य चुनाव-सम्बन्धी सामान ले जाते हैं। शांति-व्यवस्था के लिए बूथों में से संवेदनशील अथवा अतिसंवेदनशील बूथों का चयन पहले ही कर लिया जाता है। पीठासीन अधिकारी की देख-रेख में चुनाव सम्पन्न होता है। मतदान कार्य प्रातः 8 बजे से 5 बजे शाम तक चलता रहता है। मतदान के बाद मतपेटियों या इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन को सील कर दिया जाता है। मतगणना की तिथि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित की जाती है। निर्धारित समय पर मतगणना की जाती है। मतगणना स्थल के चारों ओर सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की जाती है। मतगणना के बाद जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं, उसे विजयी घोषित किया जाता है और सम्बन्धित जिले के जिलाधिकारी की उपस्थिति में उस उम्मीदवार को विजयी होने का प्रमाणपत्र दिया जाता है। उस क्षेत्र के सिविल एस.डी.ओ. या बी.डी.ओ., जो भी रिटर्निंग ऑफिसर होते हैं, उनके द्वारा विजयी होने का प्रमाण पत्र दिया जाता है।

भारत में चुनाव एक समस्या है, क्योंकि भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है। अशिक्षित जनता चुनाव का महŸव नहीं समझ पाती है। जातीयता, साम्प्रदायिकता एवं आर्थिक प्रलोभन के चक्कर में फंसकर वह अपने मताधिकार का दुरूपयोग कर बैठती है। चुनाव के समय हत्या, बूथ-कैप्चरिंग या बूथ पर भय का वातावरण बनाना आम बात है। शक्तिशाली लोग बहुमत प्राप्त करने के लिए बूथों को ही अपने पक्ष में लुटवा लेते हैं। पैसों के बल पर गरीब जनता का मत खरीद लिया जाता है। अब तो सŸाालोलुप पदाधिकारी भी बूथ लुटवाने में असामाजिक तŸवों का सहयोग करते हैं। इतना ही नहीं, वे पदाधिकारी मतगणना में भी हेराफरी से नहीं चूकते।

इस प्रकार चुनाव का अर्थ ही समाप्त हो जाता है। इस चुनाव का एक खास दोष यह भी है कि इसमें मूर्ख और विद्वान में कोई अन्तर नहीं रह जाता। यही कारण है कि आज विधायिकाओं में बुद्धिमान के बदले पहलवान लोग ही ज्यादा सुशोभित हो रहे हैं।

सारांशतः लोकतन्त्र की सफलता के लिए चुनाव का निष्पक्ष होना जरूरी है। इसके लिए चुनाव को एक पर्व की तरह मनाया जाना चाहिए। जैसे पर्व में पवित्रता का काफी महŸव है-हिंसा, बूथ-लूट, जातीयता, साम्प्रदायिकता, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि चुनाव की अपविभताएं हैं- इन्हें दूर भगाकर ही चुनाव को पवित्र बनाया जा सकता है। इसीलिए हमें यह मानकर चलना चाहिए-’’चुनाव युद्ध नहीं, तीर्थ है, पर्व है।’’

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