भाग्य और पुरुषार्थ

हमारे समाज में दो प्रकार की मान्यताएँ प्रचलित हैं- पहली भाग्यवाद तथा दूसरी पुरुषार्थवाद। भाग्यवादियों का विचार है कि किस्मत में जो कुछ लिखा है वह सब मिल जाएगा। ऐसे व्यक्ति न तो कोई काम करते हैं और न ही किसी काम के प्रति उनमें कोई उत्साह जागता है। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति पुरुषार्थवादी होते हैं जिनका ध्येय है प्रमाद को छोड़ कर्मरत रहना। कर्म करते समय वे इस बात की परवाह नहीं करते कि देखने वाले लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं। वे स्वयं लक्ष्य निर्धारित करते हैं और स्वयं उसकी प्राप्ति हेतु प्रयासरत हो जाते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है। कि जिन लोगों ने अपने जीवन में उन्नति की है उन्होंने उद्यम के बल पर ही की है। संसार में जितनी प्रकार की आर्थिक, औद्योगिक, व्यावसायिक उन्नतियाँ हुई हैं उसके पीछे एक ही कहानी है निरंतर प्रयास और सफलता । पुरुषार्थ सदैव भाग्य से अधिक शक्तिशाली है। महाराणा प्रताप ने पुरुषार्थ के बल पर दोबारा अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था। कालिदास घोर परिश्रम से एक मूर्ख से विद्वान बने । साधनहीन लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। अंतरिक्ष में मानव की जीत, चाँद पर उसका घूम आना किस बात का प्रतीक है? भाग्य या पुरुषार्थ ? विजय सर्वत्र कर्मवीर की ही होती है क्योंकि- “सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं।” उठो! चलो ! इन सँकरी-कटीली रातों के बीच तुम्हारा हाथ पकड़कर रास्ता दिखाने-बताने के लिए कोई देवदूत आने वाला नहीं है।
तुम्हारे सूखे कंठ को शीतल पानी अथवा शर्बत से तर करके तथा रास्ते में बिखरे कंकड़-पत्थरों को चुनकर तुम्हें सीधे -सहज सड़क पर ले जाने वाला कोई ईश्वरीय प्रतिनिधि आने वाला नहीं है। इन रास्तों के पत्थरों और कंकड़ों को हँदकर और काँटों को कुचलकर तुम्हें ही साहसपूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ना है। भाग्य के भरोसे बैठने वाले कभी सफलता के स्वर्ण-शृंगों पर अपने झंडे नहीं लहरा पाते। याद रखिए- ईश्वर भी सदैव उन्हीं कर्मवीरों के साथ साए की तरह रहता है जो लाभ-हानि और कष्ट-पीड़ा की चिंता किए बिना, जो पैरों की थकान की उपेक्षा करते हुए निरंतर आगे बढ़ा करते हैं। भाग्य के सहारे बैठने वाले निकम्मे और निराश-हताश ऐसे कायर लोग होते हैं जो कभी यह नहीं कहते-“जैसा मैं चाहूँगा, वैसा ही होगा।”

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