आरोह अध्याय दो काव्य भाग

प्रश्न – मीरा कृष्ण की उपासना किस रूप में करती है यह रूप कैसा है ?
उत्तर –   

हम भक्ति को दो रूपों में देखते हैं सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति मीरा कृष्ण के सगुण

रूप के उपासक थी | बचपन से ही कृष्ण भक्ति की भावना उनके अंदर जन्म ले चुकी थी
वह श्री कृष्ण को ही अपना आराध्य मानती थी | मीरा के कृष्ण का रूप मन को मोहने
वाला गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाला सिर के ऊपर मोर मुकट विराजमान श्री कृष्ण
है | मीरा उन्हें अपने पति के रुप में देखती थी वह मीरा के लिए सर्वस्व है कृष्ण के
अतिरिक्त मीरा संसार में किसी को भी अपना नहीं मानती वह स्वयं को उनकी दासी
मानती हैं |

प्रश्न – लोग मीरा को बावरी क्यों कहते हैं ?
उत्तर –
मीरा श्री कृष्ण  की भक्ति में अपनी सुध-बुध खो बैठी है | उसे किसी परंपरा या मर्यादा
का कोई ध्यान नहीं है | कृष्ण भक्ति के लिए उसने अपना राजपरिवार भी छोड़ दिया
विवाहिता होते हुए भी पांव में घुंघरू बांध कर कृष्ण की भक्ति में नाचती है | लोकलाज की
चिंता किए बिना संतों के पास बैठी रहती है | भक्ति कि यह पराकाष्ठा बावले पन को
दर्शाती है इसलिए लोग मीरा को बावरी कहते |


प्रश्न – मीरा जगत को देखकर रोती क्यों है ?
उत्तर –
मीरा जगत  के स्वार्थी रूप को देखकर रो पड़ती है यह देखती है कि जीवन व्यर्थ ही
जा रहा है | लोग संसारिक सुख दुख को असार मानते हैं जबकि उन्हें सच्चाई नहीं
मालूम हु इस संसार में ही उलझे हुए हैं | लोग मीरा को बावरी कहते हैं मीरा संसार के
लोगों को बावरा समझती है |


प्रश्न – मीरा ने सहज मिले अविनाशी क्यों कहा है ?
उत्तर –

मीरा के अनुसार प्रभु अविनाशी हैं अर्थात अनश्वर हैं | उन्हें पाने के लिए मन में सहज

भक्तिभाव की आवश्यकता है उन्हें पाने के लिए सच्चे मन से भक्ति करनी पड़ती है |
इस भक्ति से प्रभु प्रसन्न होकर भक्तों को आसानी से मिल जाते है |

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